गमक के अंतर्गत शाम ए ग़जल की सूफ़ियाना महफिल
विविध कलानुशासनों की गतिविधियों का ऑनलाइन प्रदर्शन
भोपाल । मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग की विभिन्न अकादमियों द्वारा कोविड-19 महामारी के दृष्टिगत बहुविध कलानुशासनों की गतिविधियों पर एकाग्र श्रृंखला 'गमक' का ऑनलाइन प्रसारण सोशल मीडिया प्लेटफोर्म पर किया जा रहा है| श्रृंखला अंतर्गत आज से मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी द्वारा अय्यूब गफूर और साथी, भोपाल एवं सुश्री रचना शर्मा पौराणिक और साथी, इंदौर द्वारा शाम ए ग़जल सूफ़ियाना की प्रस्तुति का प्रसारण किया गया|
गमक में आयोजित शाम-ए-गजल सूफियाना में दो कलाकारों ने अपने दल के साथ प्रस्तुति दी। प्रथम प्रस्तुति में भोपाल के मोहम्मद अय्यूब ग़फूर और दूसरी प्रस्तुति डॉ. रचना शर्मा पौराणिक, इंदौर द्वारा दी गई। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी की निदेशक डॉ. नुसरत मेहदी ने सभी कलाकारों को शुभकामनाएँ दीं।
मेवात घराने के जानेमाने गायक अय्यूब गफूर विगत तीस वर्षों से गायन करते आ रहे हैं। आपकी प्राथमिक संगीत की शिक्षा मेवात घराने के विख्यात शास्त्रीय गायक आपके पिता उस्ताद अब्दुल गफूर खां साहब से प्राप्त हुई। आपको कई सम्मानों से सम्मानित किया जा चूका है। श्री अय्यूब कई राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पानी प्रस्तुति दे चुके हैं|
शाम ए ग़जल सूफ़ियाना में ‘लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी’, ‘कभी ए हकीकते मुन्तजर नजर आ लिबासे मजाज में’ एवं ‘छाप तिलक सब छीन ली मोसे नैना मिलाइके’ का गायन किया|
प्रस्तुति में- तबले पर- श्री नईम अल्लाहवाले, ढोलक पर -श्री साबिर, ऑक्टोपैड पर - श्री वसीम मासूम, कीबोर्ड पर - श्री सहबान अय्यूब एवं श्री शाहिद मासूम और कोरस में -श्री सऊद, श्री शादाब एवं श्री हमजा ने संगत दी|
दूसरी प्रस्तुति सुश्री रचना शर्मा पौराणिक और साथियों की हुई| सुश्री रचना ने सात वर्ष की आयु से गायन की शुरुआत की| आपने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा अपनी माँ उर्मिला पौराणिक जी से ग्रहण की । सुश्री रचना ने खैरागढ़ विश्वविद्यालय से एम. म्यूज की उपाधि प्राप्त की और देवी अहिल्या विश्वविद्यालय से गायन में पीएच.डी. की। आपने कई गीत, गजल, भजन को संगीतबद्ध किया है। सुश्री रचना देश के कई प्रतिष्ठित मंचों पर अपनी प्रस्तुतियाँ दे चुकी हैं ।
प्रस्तुति में -‘वो जो हम में तुममें करार था, तुम्हें याद हो के न याद न हो', 'दाग देहलवी की खातिर से या लिहाज से मैं मान तो गया, झूठी कसम से आपका ईमान तो गया', एवं कमर जलालाबादी की- ‘कहीं भी मेरा ठिकाना नहीं जमाने में, न आशियाने के बाहर न आशियाने में’ का गायन किया|
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