जनजातीय लोक कला के अंतर्गत बुन्देली स्वराज गीत की प्रस्तुति
विविध कलानुशासनों की गतिविधियों का प्रदर्शन
भोपाल । मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग की विभिन्न अकादमियों द्वारा कोविड-19 महामारी के दृष्टिगत बहुविध कलानुशासनों की गतिविधियों पर एकाग्र श्रृंखला 'गमक' का ऑनलाइन प्रसारण सोशल मीडिया प्लेटफोर्म पर किया जा रहा है| श्रृंखला अंतर्गत आज जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी की ओर से उर्मिला पाण्डे और साथी, छतरपुर द्वारा 'बुन्देली स्वराज गीत' एवं लीलाधर रैकवार और साथी, सागर द्वारा 'ढिमरियाई नृत्य' की प्रस्तुति हुई जिसका प्रसारण विभाग द्वारा किया गया|
एक घंटे की इस प्रस्तुति में सर्वप्रथम सुश्री उर्मिला पाण्डे और साथियों ने 'बुन्देली स्वराज गीत' प्रस्तुत किये| गायन की शुरुआत चौकड़िया- बाजी भारत की रनभेरी, सुन-सुन ब्यालिस केरी से की उसके बाद पारंपरिक दादरा- देखो टूटे ना चरखा को तार, चरखवा चालू रहे, चौकड़िया- भैया अब सुराज के लाने, तन मन से लगजाने, लांगुरिया- सैंया होक भारत वासी काये हंसी करावत मोर, गारी- गांधी एक महात्मा उपजे कलयुग में अवतारी, भागे फिरंगी पहारन में पारीक्षत दहाड़े हजारन में, बिलवारी- लोहागढ़ कठिन भवास फिरंगी झाँसी भरोसे ना रहियो, चौकड़िया- लक्ष्मण सींग फिरत है दऊआ, ढिमरियाई- बांदा लुटो रात के गुइयाँ एवं लाल की फाग- कट गई झाँसी वाली रानी का गायन किया|
प्रस्तुति में सुश्री उर्मिला पाण्डे के साथ सहगायन में सुश्री मेघा श्रीवास व सुश्री कविता शर्मा ने एवं बाँसुरी पर- श्री वीरेंद्र कोरी, बैंजो पर- राजाराम विश्वकर्मा, ढोलक पर वीरेंद्र सूर्यवंशी, मंजीरा पर महेंद्र तिवारी, झींका पर मनोज नायक और घुंघरू/ नगड़िया पर राजेश तिवारी ने संगत दी|
सुश्री उर्मिला पाण्डे विगत अट्ठाईस वर्षों से बुन्देली गायन करती आ रही हैं आपको लोकसंगीत की शिक्षा अपनी माँ से विरासत में मिली| सुश्री उर्मिला ने शास्त्रीय गायन की शिक्षा पण्डित कृष्ण कुमार शास्त्री, राम प्रसाद मिश्र एवं जनार्दन खरे से प्राप्त की, आप आकाशवाणी की 'ए' ग्रेड कलाकार हैं|
दूसरी प्रस्तुति लीलाधर रैकवार और साथियों द्वारा 'ढिमरियाई नृत्य' की हुई, ढिमरियाई नृत्य ढीमर समुदाय का पुरुष प्रधान पारंपरिक लोकनृत्य है, यह वर्षभर किया जाने वाला वारहमासी नृत्य है| यह नृत्य शादी-विवाह, जन्म उत्सव एवं देवी उत्सव आदि में किया जाता है, इसमें नर्तक पैरों में घुंगरु, गमछा, धोती पहन कर सारंगी के साथ गायन व नृत्य करते हैं| इसमें कींगड़ी, बाँसुरी, तवा, खंजरी, खरताल, लोटा, झांझ और ढोलक आदि वाद्य यंत्रों का उपयोग किया जाता है |
प्रस्तुति में नृत्य/गायन/ सारंगी वादन लीलाधर रैकवार स्वयं और सारंगी वादन/ नृत्य पूरन रैकवार, ढोलक पर अमर रैकवार, लोटा पर- मुन्ना पटेल, मंजीरा पर अमरदीप रैकवार, झूला पर राकेश रजक, खंजड़ी पर संतोष सेन एवं नृत्य और खंजड़ी वादन में छोटेलाल रैकवार ने सहभागिता की|
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