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सिमट रहे भोपाली खपोटेबाज

 सिमट रहे भोपाली खपोटेबाज, खत्म हो रहा हॉकी का कल्चर

आबिद भोपाल। ये भोपाल के खपोटेबाजो का ही दम था कि तंग गलियों से निकलकर खुले मैदानों तक और फिर आसमानी ऊंचाई तक पहुंच गए। वो वक्त भी आया जब भोपाली खपोटेबाज़ ख़िताबो तक भी जा पहुंचे। मगर अब वो वक्त खत्म होने को है। बदले हालात ने जहां भोपाल के हॉकी भरे मिजाज़ को बदलकर रख दिया, वहीं खिलाड़ियों को भी। वजह जो भी हो, समाधान की कोई चर्चा नहीं । 

 *ज़मीदोज़ होती विभागीय हॉकी

- भेल के मैदानों पर अब पहले की हॉकी नही दिखती। बीएसएनएल और अन्य विभागों ने से इससे से मुंह फेर लिया। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई), नगर निगम, मध्यप्रदेश पुलिस की हॉकी मैदानों में सरपट भागती बॉल की जगह पुराने घोड़ों ने ले ली। रेलवे जैसे बड़े इदारे, पोस्टल, एयर इंडिया जैसे विभागों से भी इसका लगभग खात्मा ही हो गया। इस तरह हॉकी की उपेक्षा लगातार जारी रही। 

गुफरान काल में पली हॉकी

एक एक कर खैरख्वाह गुजरते गए। स्व. गुफ़राने आज़म साहब ने अपने कार्यकाल में इसके लिए काफी कुछ किया। यही नहीं वे खुद हॉकी से जुड़े रहे और खेल और खिलाड़ियों के लिए मसीहा बने रहे। यह वो वक्त था जब हॉकी परवान भी चढ़ी। आज भी उन्हें और उनके हॉकी प्रेम को भुलाया नही जा सकता। 

जब मैदानों से निकलकर सियासत में आई

 *बात काबिले गौर है* हॉकी जब कलाई की जगह मुँह से खेली जाने लगी, एक राज्य को हॉकी का हक़दार तस्लीम कर लिया गया तो थक गयी हॉकी । 

 *भोपाल की मिट्टी दे सकती है भारत को पुराना मुकाम?

यू तो भोपाल में कई चूल्हे आज भी हॉकी से जल रहे है, लेकिन हॉकी ओर खलाड़ी के लिए लिए चंद नाम ही ऐसे है जो आज भी दिन रात हॉकी के नाम कर रहे है । 

 *समीर दाद से उमीद बरकार :-

यहाँ प्रदेश सरकार की सराहना करनी होगी कि समीर दाद को मध्यप्रदेश हाकी एकेडमी का कोच बना भोपाल की मिट्टी पर अपना विश्वास दिखाया जो हर खिलाड़ी की नस, हद ओर काबिलियत को तराशना जानता है। जिसे राजनीति का *र* नहीं, केवल हॉकी खेलना और खिलाना आता है । थकी हारी सी हॉकी की नर्सरी को सींचने के लिए फिर ज़रूरत है हाकी प्रमोट्स ओर विभागों को जो हाकी खिलाड़ियों की भर्ती करे और उन्हें हर तरह से प्रोत्साहन दे, ताकि भारत ऑस्ट्रेलिया से 7 एक से हारे नही हरा सके । 


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